Monday, February 17, 2014

रब
कहते है की महबूब  रब होता है
पर बन जाता है पत्थर की  मूर्त
बेवफा वो जब होता है
ऐ मेरे यार मत बन बेवफा
कभी कभी ही मिलते है सच्चे चाहने वाले
वरना मंदिर में भी पाखंडियो का मेला लगा होता है

Wednesday, February 12, 2014

जरूरत 

मन को  कुछ भी अच्छा नही लगता
कंही कोई रिश्ता सच्चा नही लगता
सब करना चाहते है एक दूसरे  का इस्तेमाल
करते है सब हर दम खुशिया तलाश
पर फिर भी सब दीखते है उदास
न जाने क्यों कोई हँसता नही लगता

ऊँची हंसी, कहकहे, ये ऐश आराम,
मगर फिर भी है सबके दिल परेशान
बहुत अकेला है मन
नही लगता की कोई चलेगा संग
हर पल अपने पराये की परिभाषा बदल रही है
और आने से हर रिश्ते की सच्चाई सामने
जीवन की आशा अब निराशा में बदल रही है

बड़े अरमानो से सजोया था
इस जिंदगी में रिश्तो की बगिया को
जो कि अब अपने आप में ही
एक तमाशा बन रही है

ऐ दूसरो को इस्तेमाल करने वालो
पहले अपने सामर्थ को तो पूरा इस्तेमाल करना जानो
जब खुद को इस्तेमाल करना सीख जाओगे
तब हो जाओगे खुद में बुलंद इतना कि
किसी और को नीचा दिखाने की
जरूरत ही नही महसूस कर पाओगे II
  
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी

  

Friday, October 22, 2010

ऋतू परिवर्तन

ऋतू परिवर्तन

शरद ऋतू की ये हल्की सी धूप
आहिस्ता आहिस्ता आंगन में फैलती जा रही है
जो बनके लू दहकती थी  कभी अंगारों की तरह 
वो ही अब होकर ठंडी, 
दिन की मोहताज होती जा रही है  I
सूरज के निकलते ही सोचकर उसकी उष्णता को 
जो पृथ्वी डरकर कांपकर सहम जाती थी 
वो ही पृथ्वी अब ओढकर ठंड का दोशाला 
खड़ी सूरज की गर्मी को मुंह चिड़ा रही है  I 
जानती है वो की आगे मौसम है सर्दी का 
और उसका आस्तित्व धुंध में लिपट जाएगा
नही होगी उष्णता सूरज की गर्मी में और
वो उसका आवरण भेद नही पायेगा I
मगर नही सोचती पृथ्वी की
परिवर्तन शील है चक्र प्रकृति का
बाद सर्दी के एक बार फिर जीवन चक्र में
सूरज दुबारा गरमा जाएगा I
और बाद बसंत के  एक बार  
गर्मी का मौसम फिर से आएगा    
और भरकर सूरज उष्णता से 
उसे फिर से  जला जाएगा  I
इसी  तरह चलता है चक्र प्रकृति का 
चाहे हो सूरज, पृथ्वी या हो इन्सान 
परिवर्तन शील है हर चीज़ यहाँ पर
कुछ भी स्थाई होने का
न हो किसी को कोई गुमान  I 
बदलना ऋतू का ये ही तो जीवन की कहानी  है 
बदलो न जो ऋतू के साथ 
ये ही सच्चे इन्सान की निशानी है  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी





  

कटी पतंग

कटी पतंग
जो लगता था कभी बहुत सुनहरा
वो ही अब एक मायाजाल लगता है,
घबरा जाते थे करके कल्पना  जिसे छोड़ने की
वो ही संसार अब जी का जंजाल लगता है I  
थे लगते ये आकर्षण कभी जुगनुयो  से
वोही अब रेगिस्तान में मृगतृष्णा का ताल लगता है I
समझ जाता इस सच्चाई को तब
था जवान और था मेरा खून गर्म जब
तो तुम्हारे चरणों में रहकर आपका सत्संग करता
और बनके पतंग कभी ये उड़ान न भरता I
थी हुई उडनी शुरू जब पतंग जिन्दगी की 
तो अपनी खूबसूरती पर ये बहुत इतराती थी
होकर हवा के झोंको पर सवार
ये उपर ही उपर उडती जाती थी   I
नही सोचा कभी की जब होगी रात
लेगा लपेटेगा पतंग वापिस पतंगबाज
तो उसे वापिस जमीन पर आना है
फिर उड़े न उड़े है ये मर्जी पतंग बाज़ की
यही उसकी जिन्दगी का अफसाना है  I
इस तरह उड़ते उड़ते ये पतंग कई झोंक खा गयी
और कभी लेकर ढील कभी देकर खींच ये कई पतंग कटा गई I
नही सोचा कभी के काट काटके पतंगे
अपनी डोर भी कमजोर हो जाएगी
और आएगी  जब बारी अपनी तो
अपनी पतंग भी कट जाएगी  I
साथ उस कटी पतंग के थोड़ी
पिछले कर्मो की डोर चली जाएगी
और बांध के नई डोर उसके साथ
पतंग वापिस फिर एकबार हवा में उड़ा दी जाएगी   I
यही कहानी बार बार दोहराई जाएगी
जब तक नही करके खत्म उन कर्मो की डोर को
पतंग बिना डोर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाएगी   II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी    

परवाह किसे

 परवाह किसे
न मै खुश हूँ न नाराज़ हूँ
न दुखी हूँ न सुखी हूँ
न चाहता हूँ न नही चाहता हूँ
तो फिर ये मेरी क्या दशा है
शायद मै बेपरवाह हूँ  I
क्योंकि कभी हालात का एक हल्का सा झोंका
हिला देता था मेरे आत्म विश्वास को
क्योंकि तब मै करता था खुद पर विश्वास I
कभी हो जाता था मै इच्छुक
पाने को हरेक नई चीज़ क्योंकि
थी तब मुझ मै हर चीज़ पा लेने की चाह   I
कभी छोटे छोटे खुशनुमा हवा के झोंके
कर देते थे आनंदित मुझे क्योंकि
था चाहता उड़ना मै बनके हवा    I
फिर चली वो आंधी समय की
कि टूट गया खुद पर खुद का विश्वास  I
जिन चीजों को रखता था लगा कर दिल से
समझता था जिन्हें  सदा मै अपना
चुभती है चीज़े वोही दिल मै अब मेरे
एक नुकीले नश्तर कि तरह   I
जिन सुगन्धित हवा के झोंको को समेटा था मैंने
टकराते है वोही झोंके तपती लू कि तरह  I
तब जाना कि करना चाहत
है इस दुनिया मै सबसे बड़ा गुनाह  I
होना बेपरवाह ही इस दुनिया से
है करना अपनी सबसे बड़ी परवाह     I
हो जा बेपरवाह खुद से और दुनिया से
तभी समझेगा है उस मालिक को तेरी कितनी परवाह   II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी