Friday, October 22, 2010

परवाह किसे

 परवाह किसे
न मै खुश हूँ न नाराज़ हूँ
न दुखी हूँ न सुखी हूँ
न चाहता हूँ न नही चाहता हूँ
तो फिर ये मेरी क्या दशा है
शायद मै बेपरवाह हूँ  I
क्योंकि कभी हालात का एक हल्का सा झोंका
हिला देता था मेरे आत्म विश्वास को
क्योंकि तब मै करता था खुद पर विश्वास I
कभी हो जाता था मै इच्छुक
पाने को हरेक नई चीज़ क्योंकि
थी तब मुझ मै हर चीज़ पा लेने की चाह   I
कभी छोटे छोटे खुशनुमा हवा के झोंके
कर देते थे आनंदित मुझे क्योंकि
था चाहता उड़ना मै बनके हवा    I
फिर चली वो आंधी समय की
कि टूट गया खुद पर खुद का विश्वास  I
जिन चीजों को रखता था लगा कर दिल से
समझता था जिन्हें  सदा मै अपना
चुभती है चीज़े वोही दिल मै अब मेरे
एक नुकीले नश्तर कि तरह   I
जिन सुगन्धित हवा के झोंको को समेटा था मैंने
टकराते है वोही झोंके तपती लू कि तरह  I
तब जाना कि करना चाहत
है इस दुनिया मै सबसे बड़ा गुनाह  I
होना बेपरवाह ही इस दुनिया से
है करना अपनी सबसे बड़ी परवाह     I
हो जा बेपरवाह खुद से और दुनिया से
तभी समझेगा है उस मालिक को तेरी कितनी परवाह   II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी  

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