ऋतू परिवर्तन
शरद ऋतू की ये हल्की सी धूप
आहिस्ता आहिस्ता आंगन में फैलती जा रही है
जो बनके लू दहकती थी कभी अंगारों की तरह
वो ही अब होकर ठंडी,
दिन की मोहताज होती जा रही है I
सूरज के निकलते ही सोचकर उसकी उष्णता को
जो पृथ्वी डरकर कांपकर सहम जाती थी
वो ही पृथ्वी अब ओढकर ठंड का दोशाला
खड़ी सूरज की गर्मी को मुंह चिड़ा रही है I
जानती है वो की आगे मौसम है सर्दी का
और उसका आस्तित्व धुंध में लिपट जाएगा
नही होगी उष्णता सूरज की गर्मी में और
वो उसका आवरण भेद नही पायेगा I
मगर नही सोचती पृथ्वी की
परिवर्तन शील है चक्र प्रकृति का
बाद सर्दी के एक बार फिर जीवन चक्र में
सूरज दुबारा गरमा जाएगा I
और बाद बसंत के एक बार
गर्मी का मौसम फिर से आएगा
और भरकर सूरज उष्णता से
उसे फिर से जला जाएगा I
इसी तरह चलता है चक्र प्रकृति का
चाहे हो सूरज, पृथ्वी या हो इन्सान
परिवर्तन शील है हर चीज़ यहाँ पर
कुछ भी स्थाई होने का
न हो किसी को कोई गुमान I
बदलना ऋतू का ये ही तो जीवन की कहानी है
बदलो न जो ऋतू के साथ
ये ही सच्चे इन्सान की निशानी है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
Friday, October 22, 2010
कटी पतंग
कटी पतंग
जो लगता था कभी बहुत सुनहरा
वो ही अब एक मायाजाल लगता है,
घबरा जाते थे करके कल्पना जिसे छोड़ने की
वो ही संसार अब जी का जंजाल लगता है I
थे लगते ये आकर्षण कभी जुगनुयो से
वोही अब रेगिस्तान में मृगतृष्णा का ताल लगता है I
समझ जाता इस सच्चाई को तब
था जवान और था मेरा खून गर्म जब
तो तुम्हारे चरणों में रहकर आपका सत्संग करता
और बनके पतंग कभी ये उड़ान न भरता I
थी हुई उडनी शुरू जब पतंग जिन्दगी की
तो अपनी खूबसूरती पर ये बहुत इतराती थी
होकर हवा के झोंको पर सवार
ये उपर ही उपर उडती जाती थी I
नही सोचा कभी की जब होगी रात
लेगा लपेटेगा पतंग वापिस पतंगबाज
तो उसे वापिस जमीन पर आना है
फिर उड़े न उड़े है ये मर्जी पतंग बाज़ की
यही उसकी जिन्दगी का अफसाना है I
इस तरह उड़ते उड़ते ये पतंग कई झोंक खा गयी
और कभी लेकर ढील कभी देकर खींच ये कई पतंग कटा गई I
नही सोचा कभी के काट काटके पतंगे
अपनी डोर भी कमजोर हो जाएगी
और आएगी जब बारी अपनी तो
अपनी पतंग भी कट जाएगी I
साथ उस कटी पतंग के थोड़ी
पिछले कर्मो की डोर चली जाएगी
और बांध के नई डोर उसके साथ
पतंग वापिस फिर एकबार हवा में उड़ा दी जाएगी I
यही कहानी बार बार दोहराई जाएगी
जब तक नही करके खत्म उन कर्मो की डोर को
पतंग बिना डोर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाएगी II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
जो लगता था कभी बहुत सुनहरा
वो ही अब एक मायाजाल लगता है,
घबरा जाते थे करके कल्पना जिसे छोड़ने की
वो ही संसार अब जी का जंजाल लगता है I
थे लगते ये आकर्षण कभी जुगनुयो से
वोही अब रेगिस्तान में मृगतृष्णा का ताल लगता है I
समझ जाता इस सच्चाई को तब
था जवान और था मेरा खून गर्म जब
तो तुम्हारे चरणों में रहकर आपका सत्संग करता
और बनके पतंग कभी ये उड़ान न भरता I
थी हुई उडनी शुरू जब पतंग जिन्दगी की
तो अपनी खूबसूरती पर ये बहुत इतराती थी
होकर हवा के झोंको पर सवार
ये उपर ही उपर उडती जाती थी I
नही सोचा कभी की जब होगी रात
लेगा लपेटेगा पतंग वापिस पतंगबाज
तो उसे वापिस जमीन पर आना है
फिर उड़े न उड़े है ये मर्जी पतंग बाज़ की
यही उसकी जिन्दगी का अफसाना है I
इस तरह उड़ते उड़ते ये पतंग कई झोंक खा गयी
और कभी लेकर ढील कभी देकर खींच ये कई पतंग कटा गई I
नही सोचा कभी के काट काटके पतंगे
अपनी डोर भी कमजोर हो जाएगी
और आएगी जब बारी अपनी तो
अपनी पतंग भी कट जाएगी I
साथ उस कटी पतंग के थोड़ी
पिछले कर्मो की डोर चली जाएगी
और बांध के नई डोर उसके साथ
पतंग वापिस फिर एकबार हवा में उड़ा दी जाएगी I
यही कहानी बार बार दोहराई जाएगी
जब तक नही करके खत्म उन कर्मो की डोर को
पतंग बिना डोर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाएगी II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
परवाह किसे
परवाह किसे
न मै खुश हूँ न नाराज़ हूँ
न दुखी हूँ न सुखी हूँ
न चाहता हूँ न नही चाहता हूँ
तो फिर ये मेरी क्या दशा है
शायद मै बेपरवाह हूँ I
क्योंकि कभी हालात का एक हल्का सा झोंका
हिला देता था मेरे आत्म विश्वास को
क्योंकि तब मै करता था खुद पर विश्वास I
कभी हो जाता था मै इच्छुक
पाने को हरेक नई चीज़ क्योंकि
थी तब मुझ मै हर चीज़ पा लेने की चाह I
कभी छोटे छोटे खुशनुमा हवा के झोंके
कर देते थे आनंदित मुझे क्योंकि
था चाहता उड़ना मै बनके हवा I
फिर चली वो आंधी समय की
कि टूट गया खुद पर खुद का विश्वास I
जिन चीजों को रखता था लगा कर दिल से
समझता था जिन्हें सदा मै अपना
चुभती है चीज़े वोही दिल मै अब मेरे
एक नुकीले नश्तर कि तरह I
जिन सुगन्धित हवा के झोंको को समेटा था मैंने
टकराते है वोही झोंके तपती लू कि तरह I
तब जाना कि करना चाहत
है इस दुनिया मै सबसे बड़ा गुनाह I
होना बेपरवाह ही इस दुनिया से
है करना अपनी सबसे बड़ी परवाह I
हो जा बेपरवाह खुद से और दुनिया से
तभी समझेगा है उस मालिक को तेरी कितनी परवाह II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
न मै खुश हूँ न नाराज़ हूँ
न दुखी हूँ न सुखी हूँ
न चाहता हूँ न नही चाहता हूँ
तो फिर ये मेरी क्या दशा है
शायद मै बेपरवाह हूँ I
क्योंकि कभी हालात का एक हल्का सा झोंका
हिला देता था मेरे आत्म विश्वास को
क्योंकि तब मै करता था खुद पर विश्वास I
कभी हो जाता था मै इच्छुक
पाने को हरेक नई चीज़ क्योंकि
थी तब मुझ मै हर चीज़ पा लेने की चाह I
कभी छोटे छोटे खुशनुमा हवा के झोंके
कर देते थे आनंदित मुझे क्योंकि
था चाहता उड़ना मै बनके हवा I
फिर चली वो आंधी समय की
कि टूट गया खुद पर खुद का विश्वास I
जिन चीजों को रखता था लगा कर दिल से
समझता था जिन्हें सदा मै अपना
चुभती है चीज़े वोही दिल मै अब मेरे
एक नुकीले नश्तर कि तरह I
जिन सुगन्धित हवा के झोंको को समेटा था मैंने
टकराते है वोही झोंके तपती लू कि तरह I
तब जाना कि करना चाहत
है इस दुनिया मै सबसे बड़ा गुनाह I
होना बेपरवाह ही इस दुनिया से
है करना अपनी सबसे बड़ी परवाह I
हो जा बेपरवाह खुद से और दुनिया से
तभी समझेगा है उस मालिक को तेरी कितनी परवाह II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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