Friday, October 22, 2010

कटी पतंग

कटी पतंग
जो लगता था कभी बहुत सुनहरा
वो ही अब एक मायाजाल लगता है,
घबरा जाते थे करके कल्पना  जिसे छोड़ने की
वो ही संसार अब जी का जंजाल लगता है I  
थे लगते ये आकर्षण कभी जुगनुयो  से
वोही अब रेगिस्तान में मृगतृष्णा का ताल लगता है I
समझ जाता इस सच्चाई को तब
था जवान और था मेरा खून गर्म जब
तो तुम्हारे चरणों में रहकर आपका सत्संग करता
और बनके पतंग कभी ये उड़ान न भरता I
थी हुई उडनी शुरू जब पतंग जिन्दगी की 
तो अपनी खूबसूरती पर ये बहुत इतराती थी
होकर हवा के झोंको पर सवार
ये उपर ही उपर उडती जाती थी   I
नही सोचा कभी की जब होगी रात
लेगा लपेटेगा पतंग वापिस पतंगबाज
तो उसे वापिस जमीन पर आना है
फिर उड़े न उड़े है ये मर्जी पतंग बाज़ की
यही उसकी जिन्दगी का अफसाना है  I
इस तरह उड़ते उड़ते ये पतंग कई झोंक खा गयी
और कभी लेकर ढील कभी देकर खींच ये कई पतंग कटा गई I
नही सोचा कभी के काट काटके पतंगे
अपनी डोर भी कमजोर हो जाएगी
और आएगी  जब बारी अपनी तो
अपनी पतंग भी कट जाएगी  I
साथ उस कटी पतंग के थोड़ी
पिछले कर्मो की डोर चली जाएगी
और बांध के नई डोर उसके साथ
पतंग वापिस फिर एकबार हवा में उड़ा दी जाएगी   I
यही कहानी बार बार दोहराई जाएगी
जब तक नही करके खत्म उन कर्मो की डोर को
पतंग बिना डोर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाएगी   II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी    

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